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क्या गोरखपुर भी दिल्ली की राह पर?

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एक समय था जब वायु प्रदूषण की चर्चा होते ही केवल दिल्ली का नाम लिया जाता था। लेकिन आज यह सवाल गोरखपुर के हर नागरिक के मन में उठ रहा है — क्या गोरखपुर भी उसी राह पर बढ़ रहा है? यह सवाल डर पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि समय रहते चेताने के लिए है। गोरखपुर की हवा क्यों बिगड़ रही है? गोरखपुर कभी हरियाली, ताल-तलैया और स्वच्छ हवा के लिए जाना जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में स्थिति तेजी से बदली है। आज शहर में: सड़कों पर उड़ती धूल लगातार बढ़ते वाहन खुले में कचरा और पत्ते जलाना बिना नियंत्रण के निर्माण कार्य इन सबका सीधा असर पड़ता है AQI (Air Quality Index) पर। AQI बढ़ने का मतलब है — हवा का धीरे-धीरे ज़हरीली बनना। ज़हरीली हवा अचानक नहीं मारती, वह रोज़ सांसों के साथ शरीर में उतरती है। ज़हरीली हवा क्यों बन सकती है जानलेवा? खराब हवा का असर सिर्फ खांसी या आंखों की जलन तक सीमित नहीं है। यह लंबे समय में गंभीर बीमारियों का कारण बनती है: दमा (Asthma) फेफड़ों की गंभीर बीमारियाँ हार्ट अटैक और स्ट्रोक बच्चों के फेफड़ों के विकास में रुकावट बुज़ुर्गों के लिए जानलेवा खतरा क्या गोरखपुर भी दिल्ली की ...

चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन

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चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा की आराधना चैत्र नवरात्रि का पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। यह नवरात्रि का तीसरा दिन विशेष रूप से माँ चंद्रघंटा को समर्पित है। माँ चंद्रघंटा देवी दुर्गा के तीसरे रूप के रूप में जानी जाती हैं। उनके नाम का अर्थ है 'चंद्रमा की घंटी'। माँ चंद्रघंटा का स्वरूप माँ चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत आकर्षक है। वे तीन आंखों वाली, सोने की रंगत वाली हैं और उनके मस्तक पर चाँद के आकार की घंटी है। उनकी चार भुजाएँ हैं, जिनमें से एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में कमल, तीसरे में गदा और चौथे में चीते का मुख है। उनका यह स्वरूप शक्ति और साहस का प्रतीक है। तीसरे दिन की पूजा विधि सुबह का अभिषेक : भक्तगण सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और माँ चंद्रघंटा का अभिषेक करते हैं। पत्तों और फूलों से सजावट : माँ के स्थान को सजाने के लिए कनेर, गेंदा और चंपा के फूलों का उपयोग किया जाता है। आरती और भजन : पूजा के बाद भक्तजन माँ की आरती करते हैं और भक्ति गीत गाते हैं। व्रत का पालन : इस दिन व्रत रखने वाले भक्त फल, दूध और मेवे का सेवन करते हैं। माँ चंद्...

1 अप्रैल: ‘मूर्ख दिवस’ या भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात...

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हर साल 1 अप्रैल को दुनिया भर में अप्रैल फूल डे मनाया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के साथ मज़ाक और शरारतें करते हैं, उन्हें मूर्ख बनाते हैं और इस पर हंसते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह परंपरा भारत में क्यों मनाई जाती है, जबकि हमारी संस्कृति में किसी को जानबूझकर मूर्ख बनाना या अपमानित करना कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया? यह ब्लॉग इसी सवाल का जवाब देने का एक प्रयास है। क्या 1 अप्रैल वास्तव में एक मज़ाक भरा दिन है या यह भारतीय संस्कृति पर एक सोची-समझी चोट है? अप्रैल फूल डे: पश्चिमी परंपरा का अंधानुकरण 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस मनाने की परंपरा मुख्यतः यूरोप से आई है। ऐसा कहा जाता है कि 1582 में जब फ्रांस ने ग्रीगोरियन कैलेंडर अपनाया, तो नए साल की तारीख 1 जनवरी कर दी गई , लेकिन जो लोग पुरानी परंपरा के अनुसार 1 अप्रैल को नया साल मानते रहे, उन्हें मज़ाक का पात्र बना दिया गया और ‘अप्रैल फूल’ कहा जाने लगा। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे यूरोप और फिर अमेरिका तक फैल गई। ब्रिटिश शासन के दौरान यह भारत में भी आई और हम इसे अपनी संस्कृति से जोड़े बिना ही अपनाने लगे । भारतीय संस्कृति...